शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

श्रीकृष्ण चरित्र का यथार्थ : एक दृष्टि .


भारतीय जन-मानस में श्रीकृष्ण की छवि ईश्वर का पूर्णावतार होने के साथ परम रसिक नायक एवं प्रेम तथा करुणा के आगार के रूप में विद्यमान है .अपनी रुचि के अनुसार उसे इन दोनों के अलग-अलग अनुपातों में ढाल लिया जाता है.इन्हीं दोनों का गहरा आवरण उनके कठोर चुनौतियों भरे जीवन की वास्तविकताओं को गौण बना देता है .लेकिन गीता के गायक का व्यक्तित्व ,ठोस वास्तविकता से परिपूर्ण रहा है. 

      श्रीकृष्ण ने जिस धर्म की अनुशंसा की वह किसी परलोक के लिये नहीं , इसी लोक-जीवन के लिये आनन्द,शान्ति और कल्याण का विधान है,जो समाज और व्यक्ति के जीवन को सुन्दर संतुलित और सरस बनाने का संदेश दे कर संगति ,समता एवं सहिष्णुतामय  जीवन की अपेक्षा करता है. वे सच्चे कर्मयोगी थे, जिन्होंने जो स्वयं जिया उसी का उपदेश दिया.जन्म से लेकर परमधाम प्रस्थान तक उनका जीवन संघर्षो में बीता. जनहित के लिये विषम स्थितियों से निरंतर जूझे, सब के प्रति जवाबदेह बन कर स्वयं में नितान्त निस्पृह,निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
       लोक कल्याण के लिये जो अपना ही अतिक्रमण कर गया वह व्यक्ति श्रीकृष्ण हैं . अनीति और अन्याय के विरोध में ,अपना मनोरथ सिद्ध करने को , किसी के या स्वयं के वचन का बहाना नहीं लिया .विषम स्थितियों को किसी भी तरह सम बनाना, समाज और व्यक्ति के लिये जो संगत और हितकारी हो वही करने को प्रेरित किया . आगे का सारा भविष्य जिससे प्रदूषित हो जाये, जिसका निराकरण कभी न हो सके  उस स्थिति को टालने के लिये वे हर मूल्य पर तत्पर रहे.ऊपरी आदर्शों का आडंबर उन्होंने कभी नहीं पाला .उनका धर्म लोक-जीवन को सहज-स्वाभाविक एवं सुूखमय बनाने की परिकल्पना लेकर चला था, नृत्य-गान आदि कलाओं से जीवन पूर्ण और सरस हो जाये.वैयक्तिक विकृतियों का यही मानसिक उपचार बन जाए.
       मानसिकता के उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठित उनका अदम्य व्यक्तित्व मानव मात्र की मुक्ति का विधान कर गया . कंस के आतंक और षड्यंत्रों के बीच पल कर मानवता की रक्षा के लिये , प्रचलित मान्यताओं से विद्रोह की सीमा तक जा कर वे अन्याय एवं रूढ़ परिपाटियों का प्रतिकार करते रहे.
नारी को खाँचों की घुटन से निकाल कर ,उसकी मनुजोचित निजता और गरिमा को प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . पशुबल से पराभूत की गई स्त्री को कलंकित मान कर त्याग देने की समाज-प्रचलित मानसिकता के निराकरण हेतु भौमासुर द्वारा अपहृता सोलह हज़ार नारियों को बंदी जीवन से मुक्त ही नहीं कराया उन्हें ,तिरस्कार से बचाने के लिये उनसे स्वयं विवाह करने का साहसिक कदम उठा कर , सामाजिक स्वीकृति और सम्मान प्रदान किया. नारी-पुरुष संबंधों का चिर-विवादित समाधान उनके संतुलित एवं उन्नयनकारी मैत्री-भाव में प्रतिफलित हुआ .
        मेरे मन में एक बात बार-बार आती है - अर्द्धांगिनी सहित छत्र-छँवर धारे, सिंहासनासीन ,बंधु-बाँधवों से सेवित प्रभुतासंपन्न भूपति के रूप में श्रीकृष्ण का चित्र मैंने कहीं नहीं देखा .देखा तो चक्र लेकर दौड़ते हुये ,रथ संचालित करते , गीता का उपदेश देते और देखा है ग्रामों के सहज-सरल परिवेश के बीच, गोप परिवार के चपल बालक की कौतुक-क्रीड़ाओं वाली चर्या की झाँकियों में . श्रीकृष्ण का लोक-रंजक किन्तु अदम्य  कभी रूढ़ प्रतिमानों में नहीं बँधा    -जूठन खाई,अपने ,पीतांबर में पांचाली के पदत्राण समेटे , युद्ध छोड़ भागे , स्वयं अपनी प्रतिज्ञा भंग करने में संकोच नहीं किया,मित्र से बहन का अपहरण करा दिया,हँसकर वंशनाश का शाप सिर धर लिया, अपने हित-साधन हेतु नहीं ,अनर्थों के निवारण के लिये अनिष्टों के निस्तारण के लिये . सबके कल्याण के लिये जो अपने ,यश-अपयश,सुख-दुख , हानि-लाभ से निस्पृह रहा हो , वही उच्चाशयी , श्रीकृष्ण के समान स्वयं अपना अतिक्रमण करने में समर्थ एवं सिद्ध-मति हो सकता है .
          अब थोड़ी चर्चा उनकी सखी ,मनस्विनी पांचाली के संदर्भ में  .इस नारी की प्रखरता और विदग्धता से हत पुरुषवर्ग कितने रूपों में उस के विखंडन का, उसके गौरव को क्षीण करने का प्रयास करता है ,उसे अपमानित करने और नीचा दिखाने से कभी चूकता नहीं और विषम समय में सिद्धान्तों की आड़ ले कर स्वजन और गुरुजन भी किनारा कर जाते हैं .तब पग-पग पर विशृंखलमना होती है पांचाली ,पर समेटती है अपने आप को .कैसा कड़वा सच है कि अपने कर्तव्य पूर्ण करने के लिये , अपने दायित्व -निर्वहन के लिये नारी को स्वयं के प्रति कितना निर्मम होना पड़ता है , प्रत्यक्ष उदाहरण है वह .

               लेकिन कृष्ण जैसा सखा है उसके साथ - क्षीण होता मनोबल साधने को ,विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्तव्य-पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी .तुम उन सबसे बीस ही रहोगी क्योंकि तुम्हारी बुद्धि बँधी नही है ,विवेक जाग्रत है ,निस्स्वार्थ भावनायें और निर्द्वंद्व मन है . पांचाली के विषम जीवन की सांत्वना बने कृष्ण उसे प्रेरित करते हुए आश्वस्त करते हैं कि दुख और मनस्ताप कितना ही झेलना पड़े ,अंततः गरिमा और यश की भागिनी तुम होगी.और कृष्ण-सखी के जीवन में कृष्ण के महार्घ शब्द अपनी संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ चरितार्थ होते हैं.
              मित्र के रूप में एक जीवन्त प्रेरणा बराबर उसके साथ रही जो प्रत्यक्ष कर गई कि विरोधी परिस्थितियों की निरंतरता में भी असंपृक्त रह कर किस प्रकार व्यक्ति अपने निजत्व को अक्षुण्ण रख सकता है .
जाने कितने जन्मों के पुण्य जागते हैं तब ऐसे व्यक्ति का सान्निध्य मिल पाता है जिससे जीवन कृतार्थ हो जाये .विपदाओँ से उबारने में सदा सहयोगी, सामाजिक विषमताओं को अपने नीति-कौशल से सम की ओर ले जाने वाला निष्काम कर्म-योगी कृष्ण और बिडंबनाओं से निरंतर जूझती तेजस्विनी पांचाली की मित्रता एक उदाहरण है आज के देहधर्मी नर-नारियों के लिये कि संसार में बहुत-कुछ ऐसा है जिसकी अवधारणा ,मानसिकता के उच्चतर स्तरों पर प्रतिष्ठित कर जीवन को श्रेष्ठतर बना कर सांसारिक व्यवहार का मूल-मंत्र बनी रहे . गिरावट और आक्रामक होती कामनाओँ से ग्रस्त आज की मनुष्यता को उबारने के लिये इससे बड़ा अवदान और क्या हो सकता है!
- प्रतिभा सक्सेना.

*
डॉ शकुन्तला बहादुर के शब्दों में -

 नर-नारी के संबंध सदा से विविध रूपों में सामने आते रहे हैं .पारस्परिक संबंधों का जो  उज्ज्वल  रूप यहाँ चित्रित है वह बिंब-प्रतिबिंबवत् एक दूसरे की मनोभावनाओं को निरूपित करते हुये पारस्परिक प्रेरणा का स्रोत बनता है .देह के आकर्षण से परे दोनों की आत्मीयता जिस विश्वास पर आधारित है वह  सारे संबंधों को पीछे छोड़   मानव-जीवन के उच्चतर मान स्थापित करती है.पूर्ण  आश्वस्ति और गहन निष्ठा से पूर्ण यह मैत्री जिसे मिल सके सचमुच उसका जीवन धन्य हो जाता है . ऐसे ही घटनाक्रम की  मर्मकथा है -पूर्णावतार श्रीकृष्ण और याज्ञसेनी पांचाली की मैत्री को आधार बना कर लिखा गया  यह उपन्यास- कृष्ण-सखी .
- डॉ. शकु्न्तला बहादुर.


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

कृष्ण सखी - एक प्रतिक्रया

*
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक ऐसा नाम है जिनके नाम से जुड़े हैं उत्कृष्ट खण्ड-काव्य, लोक गीत, हास्य-व्यंग्य, निबंध, नाटक और जुड़ी हैं कहानियाँ, कविताएँ तथा बहुत सारी ब्लॉग रचनाएँ. विदेश में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य की सेवा वर्षों से कर रही हैं. बल्कि यह कहना उचित होगा कि चुपचाप सेवा कर रही हैं. सीमित पाठकवर्ग के मध्य उनकी रचनाएँ अपना एक विशिष्ट स्थान रखती हैं. इनकी प्रत्येक रचना उत्कृष्टता का एक दुर्लभ उदाहरण है और भाषा वर्त्तमान में लुप्त हो चुकी है. “कृष्ण-सखी” डॉ. प्रतिभा सक्सेना का नवीनतम उपन्यास है, जिसकी प्रतीक्षा कई वर्षों से थी.
विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आया है कि पौराणिक उपन्यासों के प्रकाशन की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. इनमें से कुछ उपन्यास/ ग्रंथ पौराणिक पात्रों और घटनाओं को लेकर काल्पनिक कथाओं के आधार पर लिखे गये हैं तथा कुछ उन घटनाओं की अन्य दृष्टिकोण से व्याख्या करते हैं. यह सभी उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुए. किंतु ध्यान देने की बात यह है कि सभी उपन्यास मूलत: अंग्रेज़ी में लिखे गये तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उनका हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित किया गया, जो अंग्रेज़ी पाठक-वर्ग से इतर अपना स्थान बनाने में सफल हुआ.
कथानक
“कृष्ण सखी”, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कृष्ण और उनकी सखी मनस्विनी द्रौपदी के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालता है. उपन्यास की कथा मूलत: महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ “महाभारत” की कथा है. किंतु इसमें महाभारत की उन्हीं घटनाओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है जहाँ कृष्ण अथवा द्रौपदी की उपस्थिति है. अन्य घटनाओं का विवरण सन्दर्भ के रूप में अथवा उस रूप में उल्लिखित है, जिस रूप में वह घटना इनकी चारित्रिक विशेषताओं को रेखांकित करती है. मत्स्य-बेध, पाँच पतियों के मध्य विभाजन, वन गमन, सपत्नियों व उनकी संतानों का उल्लेख, कर्ण के प्रति मन में उठते विचार व द्विधाएँ, चीर हरण, कुरुक्षेत्र का महासमर, भीष्म से प्रश्न, पुत्रों की हत्या और अंतत: हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं के मध्य हिम समाधि... यह समस्त घटनाक्रम पांचाली के सन्दर्भ में तथा कारागार में जन्म, मातुल द्वारा वध किये जाने की आशंका में भगिनी के जीवन के दाँव पर जीवन दान पाना, राधा तथा अन्य गोपियों के साथ रास रचाना, फिर उन्हें छोड़कर द्वारका प्रस्थान करना, सखा अर्जुन को प्रेरित कर निज बहिन का अपहरण करवाना, युद्ध में सारथि तथा एक कुशल रणनीतिज्ञ की भूमिका निभाना, गान्धारी का शाप स्वीकार करना, अश्वत्थामा को शापित करना तथा एक वधिक के वाण द्वारा मृत्यु को प्राप्त होना जैसी घटनाएँ कृष्ण के सन्दर्भ में प्रस्तुत की गयी हैं.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
अंत में:
उपन्यास का कलेवर आजकल जिस प्रकार के उपन्यास बाज़ार में उपलब्ध है उसके समकक्ष रखने का प्रयास प्रकाशक “शिवना प्रकाशन” द्वारा किया गया है. आवरण चित्र मनस्विनी द्रौपदी को पारम्परिक रूप में दर्शाता है, जबकि उपन्यास की माँग उसके सर्वथा विपरीत है. चित्रकार द्रौपदी की विशेषताओं से नितान्त अनभिज्ञ है, उसकी विपुल केश-राशि के स्थान पर दो-चार लटें दिखा कर दीनता में और वृद्धि कर दी है, केशों से आच्छादित हो कर वह अधिक गरिमामयी और वास्तविक लगती . ग्राफिक्स की मदद कम ली गई है जिसके   आवरण थोड़ा फीका दिखता है.
पौने तीन सौ पृष्ठों के इस उपन्यास का मूल्य रु.३७५.०० हैं, जो बाज़ार के हिसाब से अधिक है. मैंने इस उपन्यास की मूल पांडुलिपि पढ़ी है, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ की प्रकाशक ने पुस्तक “प्रकाशित” नहीं की है बल्कि “छाप दी है”. क्योंकि अनुमानतः ९०% पृष्ठों में वाक्य एक पंक्ति में बिना विराम चिह्न के समाप्त होता है तथा दूसरी पंक्ति में विराम चिह्न से आरम्भ होता है. टंकण की त्रुटियाँ जैसी पांडुलिपि में थीं हू-ब-हू उपन्यास में भी देखी जा सकती हैं. संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रूफ-रीडिंग की ही नहीं गई है.
उपन्यास में सबसे निराश करने वाली बात यह है कि रचनाकार की ओर से कोई वक्तव्य नहीं है – यथा उपन्यास की रचना प्रक्रिया, रचना के सृजन का मुख्य उद्देश्य, पाठकों के नाम सन्देश, आभार आदि. लेखिका की ओर से यह पुस्तक कृष्ण भगवान को समर्पित है. पुस्तक के प्रारम्भ में उपन्यासकार का परिचय या भूमिका या किसी अन्य साहित्यकार, मित्र अथवा सहयोगी द्वारा नहीं दिया गया है.
आजकल जितने भी उपन्यास “बेस्ट सेलर” की श्रेणी में आते हैं, उनसे यह उपन्यास कहीं भी उन्नीस नहीं है, लेकिन अप्रवासी लेखक के लिये एक प्रबंधन टीम द्वारा पुस्तक का विज्ञापन अथवा मार्केटिंग करना संभव नहीं, इसलिए यह उपन्यास, उपन्यास न होकर एक शृंखलाबद्ध ब्लॉग पोस्ट का पुस्तक संस्करण भर होकर न रह जाए इसका दुःख होगा मुझे व्यक्तिगत रूप से.
- सलिल वर्मा.
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ -

श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ -
कृष्ण -सखी का यह मूल्यांकन ऐसा लगा जैसे पूरी तरह रचना के गहन में प्रविष्ट होकर सम्यक् दृष्टि को साक्षी बना कर क्रम-बद्ध आकलन किया गया हो .
रचनाकार के साथ जुड़ कर अंतरंग का ,और सजग-सचेत मस्तिष्क से बाह्य पक्षों का संतुलन जहाँ संभव हो जाये वहाँ रचना का होना अर्थपूर्ण हो जाता है ..सलिल ,तुमने यह संभव कर दिया.
यह बौद्धिक-श्रम-साध्य कार्य तुमने जिस निपुणता से किया मैं विस्मित हूँ ,तुम्हारे विश्लेषण ,विवेचन और निर्धारण की कुशलता से प्रभावित हूँ ,साहित्य की तुम्हारी परख पर गर्वित भी हूँ .
हाँ,मैं तुमसे सहमत हूँ कि कवर-पेज के चित्र के साथ उपन्यास के घटनाक्रम और चरित्र की संगति नहीं बैठती. बस ,होता यह है कि श्रीकृष्ण और द्रौपदी का नाम सुनते ही साधारणतया लोगों का मन चीरहरण और द्रौपदी की पुकार पर पहुँच जाता है .मुखृपृष्ठ के अंकन में यही हुआ है. उपन्यास के कथा-क्रम में न चीरहरण का दृष्य है न पाँचाली के दैन्य का चित्रण,वह अनन्य रूपसी विपुल केश राशि की धारणकर्त्री थी यह भी उस चरित्र का सत्य है- तुम्हारी सूक्ष्म दृष्टि धन्य है . तुमने हर तथ्य पर ध्यान दिया और दिलाया.
एक और बात- प्रूफ़ पढ़ने को मैं तैयार थी ,उनसे कहा भी था पर वे अपने यहां ही वह काम करना चाहते थे. भूमिका भी मेरी मान्यताओं को स्वर देती , तैयार थी -उसे भी सामने आने का अवसर नहीं मिला . उपन्यास में प्रकाशन के लिये उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई इस आधार पर कि कथाक्रम स्वयं अपनी बात कह लेगा .
यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक समझती हूँ
उन दिनों मेरे पति को स्ट्रोक पड़ा था. मैं प्रकाशन से भी नितान्त उदासीन थी. मेरी मित्र शकुन्तला जी प्रारंभ से ही इस उपन्यास को प्रकाशित करवाने को उत्सुक थीं ,अपने प्रयासों से उन्होंने सारी व्यवस्था की -उनके मन में अपार लगन और मेरे लिये शुभाशंसा ही उन्हें प्रेरित कर रही थी .इस बड़े काम का सारा श्रेय शकुन्तला जी को ही है कि उन्होंने आगे रह कर सब-कुछ कराया. मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि इतनी शीघ्रता से उपन्यास छप जायेगा ('छप गया' प्रकाशन की ओर से यह सूचना पाकर मैं सचमुच विस्मित हो गई थी).मैं उन की आभारी हूँ कि आज मेरी एक पांडुलिपि पुस्तकाकार रूप में सामने है और हमलोग उस पर संवाद कर सके हैं .और भी बताऊ -उन्हीं ने बहुत उत्साहपूर्वक ,अपनी विशेष पहुँच और प्रयत्नों से उसका विमोचन भी,सैन- फ्रान्सिसको स्थित भारत के कांउसल जनरल द्वारा सुप्रसिद्ध बर्कले वि.वि. में संपन्न होना संभव कििया. उपन्यास मेरे हाथ में भी नहीं आया था - तब तक मैने देख भी नहीं पाया था..और पहले ही शकुन्तला जी ने किसी प्रकार एक्सप्रेस मेल से प्रतियां मँगा कर विमोचन कार्य भी संभव करा दिया - मैं उनकी चिर-ऋणी हूँ.
इन दिनों भी मैं अपनी समस्याओँ से मुक्त नहीं हूँ ,सलिल का यह आलेख पढ़ उसी दिन लिया था ,लिख आज पाई हूँ .बहुत शान्ति से नहीं बैठ पा रही हूँ अभी भी , जब तक श्री मान जी घर नहीं आ जाते .जो लिख पाई उससे ही मेरी बात समझ लेना ,जो छूट गया उसके लिये क्षमा माँगती हूँ
तुम सलिल ,उसका मूल्यांकन कर मुझे गौरवान्वित कर रहे हो .साथ में और भी कितने सहृदयजन अपने उद्गार दे कर मेरा मान बढ़ा रहे हैं.
मैं सबकी आभारी हुई .
- प्रतिभा सक्सेना.

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

एक ज्ञापन -

एक ज्ञापन -
Shivna Prakashan
वरिष्ठ प्रवासी कथाकार प्रतिभा सक्सेना द्वारा कृष्ण तथा द्रोपदी पर लिखा गया उपन्यास कृष्ण सखी शिवना प्रकाशन के जुलाई-अगस्त में प्रकाशित होने वाले सेट के अंतर्ग..वरिष्ठ प्रवासी कथाकार प्रतिभा सक्सेना द्वारा कृष्ण तथा द्रोपदी पर लिखा गया उपन्यास कृष्ण सखी शिवना प्रकाशन के जुलाई-अगस्त में प्रकाशित होने वाले सेट के अंतर्गत प्रकाशित होकर आ गया है। यह पुस्तक निम्न ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध है 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

जहँ-जँह चरण पड़ें ....

               *  
              इंसानी कारस्तानियों से तो अब सारी दुनिया पनाह माँगने लगी है .एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में सामने आया है.अमेरिका का, अपनी विविधता के लिये विख्यात येलोस्टोन नेशनल पार्क , जो इतना विशाल है कि  तीन राज्यों में - मोंटाना,व्योमिंग और आइडाहो -फैला है . इसे  धरती मां की जीवंत प्रयोगशाला कह सकते हैं जिस में विकास और विनाश के रहस्य अध्ययन करने का पूरा पूरा अवसर है.पृथ्वी के निर्माण और संचालन प्रक्रिया को समझने के लिए यह क्षेत्र आदर्श है , यही नहीं यहाँ ११,००० वर्षों से मानवीय गतिविधियां निर्बाध रूप से चल रही हैं इस लिए जैाविक और भूतलीय विविधताओं का सिलसिलेवार लेखा मौजूद है.  
                    ये मनुष्य नामक जीव हर जगह अपनी टाँग अड़ाने पहुँच जाता है .प्रकृति के सारे  सुनियोजित कार्यों और सार्थक व्यवहारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है -बिना जाने कि परिणाम क्या होगा .नेशनल पार्क सर्विस की स्थापना के बाद से १९१६ में इसे उसके अधीन कर दिया गया. और  जंगल के प्राकृत नियमों की जगह इंसानी व्यवस्था के प्रभाव में आने लगा.उसे सिर्फ़ अपनी पड़ी है.प्रकृति को सब का सब-कुछ
आगे भविष्य तक का सोच कर आगे बढ़ना होता है. होता है .एक पूरी शृंखला पड़ी है उसके लिये - जड़ से लेकर चेतना के उच्चस्तरों तक .जिन्हें हम जड़ समझते हैं ,भू-तल,नदी पर्वत से लेकर  उद्भिज अंडज,योनिज सब अपने संपूर्ण भाग-अनुभागों  विभागों सहित .और सब में  ताल-मेल बैठाने का दायित्व सँभालती है .सारे एक दूसरे को प्रभावित करते हुये और होते हुये.पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियाँ ,नदियाँ मिट्टी तक आपसी तालमेल से जुड़े रहते हैं ,एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और करते हैं.सब में ऐसी   घनिष्ठता कि एक कड़ी में व्यवधान पड़ेतो सारी शृंखला हिल जाये.सच में तो यही उसका कारॆॆॆ कार्यक्षेत्र है, उसकी प्रयोगशाला है जहाँ अनगिनती प्रयोग लगातार चलते  हैं -न समय की कोई सीमा  न सामग्री की .अतुल भंडार है उसका ,जब जो चाहती है उगा लेती है.एक पेड़ के लिये सैकड़ों बीज एक फल के लिये अऩगिन फूल . और  मूर्ख आदमी समझे बैठा है उसके सुख  के लिये हैं ये सब.यह आयोजना बड़ी लंबी-चौड़ी है.लयबद्धता के साथ ऋतु-क्रम में सारे संतुलन बैठाने की सामर्थ्य प्रकृति के मदरबोर्ड की जीवन्त प्रोग्रामिंग से ही हो सकती  है ..
                 प्राकृतिक जीवन के सामान्य कार्य संपादन तक की अक्ल या  तो है नहीं चल पड़ता है  अपना फ़ितूर लेकर .यहाँ भी सुनियोजित  शृंखला की घनिष्ठ कड़ियों में तोड़-मोड़ करने लगा .जंगल का सारा संतुलन बिगाड़ कर  रख  दिया. सब गड़बड़ होने लगा - नदियाँ विध्वंस पर उतारू हो गई ,भूमि कटने  लगी जंगल  तरुहीन होने लगे,पक्षी पलायन कर गये. हरा-भरा प्रदेश  उजाड़ होने लगा.प्रकृति की योजना में सेंध लगा  सारी व्यवस्था भंग हो गई .
               उसने किया ये  कि बेकार की आफ़त समझ कर जंगल से भेड़ियों का  सफ़ाया कर दिया -70 साल तक भेड़िया रहित बनाये रखा रहा  जंगल को . परिणामतः  हिरणों की भरमार हो गई ,दुर्लभ और उपयोगी वनस्पतियाँ उनके चराव से नष्ट होने लगीं.छोटे पौधे पत्रहीन हो सूख गये ,नये वृक्ष उगना बंद ,पुराने जर्जर.  पक्षी आश्रयहीन हो पलायन कर गये.बीवर जो नदियों में बाँध  बना कर उन्हें संयमित करते थे पलायन कर गये.नदियों का प्रवाह अनियंत्रित हो मनमानी करने लगा.पशु-पक्षियों के बिना बीजों का बिखराव कैसे हो  ,ऊपर से बढ़ता जाता हिरणों की चराव ,हरा-भरा वन उजड़ कर मरुथल बनने लगा
                यह सब  था आदमी के दिमाग़ी फ़ितूर का नतीजा. खिड़कियाँ कुछ खुलीं तो 1995 में फिर से  भेड़ियों का झुंड  जंगल में भेजा गया .जीवन व्यवस्थित होने लगा  नवागतों के  शिकार से हिरणों की संख्या घटी ,धरती पर वनस्पतियाँ पनपने लगीं .पौधे पनपने बड़े होने से पक्षियों की चहक फिर गूँजने लगी . उन्होंने फल कुतर-कुतर कर दूर-दूर तक बीज बिखेरे, नई वृक्षावियाँ सज गईँ . छः-सात वर्षों में जंगल लहलहा उठा.
बीवर लौट आये नदियों पर बाँध बनाने लगे ,नदियाँ संयत हुईं.जलपक्षी बिहार करने लगे.सियारों को भी मारा भेड़ियों ने ,परिणामतः  खरगोशों और चूहों की संख्या बढ़ी ,लोमड़ियाँ ललचाईं ,फिर उनके खाने से बचे अवशेषों पर बाज़-गिद्धों को आमंत्रण मिला.फलदार पेड़ों ने भालुओँ को दावत दी, जिनके आने से हिरण और भेड़ियों पर नियंत्रण हुआ.बीवरों के बाँधों से नदियों की मनमानी नहीं चली ,मिट्टी का कटान रुक गया.सारा क्रम व्यवस्थित हो गया.भेड़ियों की आवक क्या हुई  जंगल का जीवन फिर गुलज़ार हो गया .
               यहाँ कहीं कुछ भी व्यर्थ या असंबद्ध नहीं.यों देखा जाय तो मनुष्य भी उसी शृंखला की एक कड़ी है ,उसका भी शेष सबसे घनिष्ठ संबंध है .एक ही ऋत सबका संचालक - पर कैसा दुर्मति  है , इंसान प्रकृति के तारतम्यमय जीवन में दखलंदाज़ी कर  सारी समरसता विकृत कर डालता है. 
   आदमी नाम का ये प्राणी कब क्या करेगा कोई ठिकाना नहीं , दिमाग़ हमेशा किसी खुराफ़ात के चक्कर में रहता -रातों में नकली  रोशनी में काम करता है , दिन में रोशनी के रास्ते बंदकर आराम करता है.न समय पर जागता है न समय से सोता है .खाने को जाने क्या अल्लम-गल्लम ,पीने को कुछ विचित्र मिश्रण ,पहनने को अजीब ढंग के चिपके ,ढीले,बेतुके ,बनावटी कपड़े . हवा-पानी ,ज़मीन-आसमान हर जगह कुछ न कुछ लफड़े. अपनी सारी  सहजवृत्तियाँ कुंठित कर ली ,लगता है कुछ समय में ये भी भूल जायेगा कि जीवों में किस जाति का प्राणी है .किताबें खोल कर पता करना पड़ेगा कि सृष्टि के विकास क्रम में कहाँ खड़ा है.
यही सब देख कर अब तो  विश्वास हो चला है   -
                'जहँ जहँ चरण पड़ें मनुजन के तहँ-तहँ बंटाढार '.
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सोमवार, 7 अगस्त 2017

ये भी सुन लीजिये --

Suryakant Madhav Karandikar की वाल से -

*" उरुग्वे "* एक ऐसा देश है , जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास 4 गायें हैं ... और
पूरे विश्व में वो खेती के मामले में नम्बर वन की पोजीशन में है ...
सिर्फ 33 लाख लोगों का देश है और 1 करोड़ 20 लाख 🐄 गायें है ...
हर एक 🐄 गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक 📼 चिप लगा रखी है ...
जिससे कौन सी 🐄 गाय कहाँ पर है , वो देखते - रहते हैं ...
एक किसान मशीन के अन्दर बैठा , फसल कटाई कर रहा है , तो दूसरा उसे स्क्रीन पर जोड़ता है , कि फसल का डाटा क्या है ... ???
इकठ्ठा किये हुये डाटा के जरिए , किसान प्रति वर्ग मीटर की पैदावार का स्वयं विश्लेषण करता हैं ...
2005 में 33 लाख लोगों का देश , 90 लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था ... और ...
आज की तारीख में 2 करोड़ 80 लाख लोगों के लिये अनाज पैदा करता है ...
*" उरुग्वे "* के सफल प्रदर्शन के पीछे देश , किसानों और पशुपालकों का दशकों का अध्ययन शामिल है ...
पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनियर लगाए गए हैं और ये लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानों पर नजर रखते हैं , कि खेती का वही तरीका अपनाएँ जो निर्धारित है ...
यानि *" दूध , दही , घी , मक्खन "* के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा अनाज उत्पादन ...
*" सब अनाज , दूध , दही , घी , मक्खन , आराम से निर्यात होते हैं और हर किसान लाखों में कमाता है ... "*
एक आदमी की कम से कम आय 1,25,000/= महीने की है , यानि 19,000 डॉलर सालाना ...
*" इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य 🌞 व राष्ट्रीय प्रगति चिन्ह गाय 🐄 व घोड़ा 🐎 हैं ... "*
*" उरूग्वे में गाय 🐄 की हत्या पर तत्काल फाँसी का कानून है ...
*" धन्य है , यह गौ - प्रेमी देश ... "*
मुख्य बात यह है , *" कि ये सभी गो - धन भारतीय हैं ... "*
जिसे वहाँ *" इण्डियन काउ "* के तौर पर जानते हैं ...
*" दु:ख इस बात का है , कि भारत में गो - हत्या होती है और वहाँ उरुग्वे में गो - हत्या पर मृत्युदण्ड का प्रावधान है ... "*
*" क्या हम इस कृषक राष्ट्र उरुग्वे से कुछ सीख सकते हैं ... ???
*" _ Forwarded as received ... _ "*


शनिवार, 29 जुलाई 2017

हम भी हैं पाप के भागी -

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रात्रि आधी से अधिक बीत चुकी थी ,हमलोगों को लौटने में बहुत देर हो गई थी ,उस कालोनी में अँधेरा पड़ा था.कारण बताया गया कि रात्रि-चर और वन्य-प्राणी भ्रमित न हों इसलिये रोशनियाँ बंद कर दी गई हैं.मन आश्वस्त हुआ .
पिछले दिनों एक समाचार बहुत सारे प्रश्न जगा गया था-  ऋतु-क्रम में होनेवाली अपनी प्रव्रजन यात्रा में दो हज़ार पक्षी टोरेंटो से जीवित नहीं लौट सके. जी हाँ ,दो हज़ार पक्षी . प्रव्रजन  क्रम में काल का ग्रास बन गये. प्रकृति के सुन्दर निष्पाप जीव मनुष्य के सुख-विलास के, उसकी असीमित सुख- लिप्सा की भेंट चढ़ गये.दो हज़ार पक्षी !वहीं के वहीं दम तोड़ गए. रात में मानवकृत रोशनियों से भरमा कर उड़े ,ऊंची इमारतें अड़ी खड़ी थीं ,खिडकी के शीशों में खुले आकाश और वनस्पतियों के प्रतिबिंब, जिन्हें देख अच्छा खासा आदमी भरमा जाये ,पूरे वेग से उडान भरी .अगले ही क्षण  ज़ोरदार टक्कर खाकर टूटे पंख और घायल शरीर ले  होश-हवास गुमा धरती पर आ गिरे .कैसी यंत्रणामय  मृत्यु रही होगी !
गगनचुंबी इमारतें ,बनावटी रोशनियाँ और शीशेदार खिड़कियाँ - बेचारे पक्षी विवश और भ्रमित होते रहे - ठंडी हवाओं में ,राह रोकती इमारतों के कारण उड़ न सके ,शीत से जम गये, रात को कृत्रिम रोशनी उन्हें भरमा  देती ,दिन में खिड़कियों के शीशों में वृक्ष-वनस्पतियोंवाले आकाश के प्रतिबिंबों से भ्रमित  वेग से उड़ते , टकराते ,घायल हो  गिरते, तड़पते मरते  रहे .उन्होंने प्रकृति के अनुकूल आचरण किया था - काहे की सज़ा मिली ?मनुष्य अपनी खुराफ़ातों से बाज़ नहीं आता ,अपने स्वार्थ के लिये दूसरों की बलि चढ़ा देता है .

घटना टोरेंटो की है पर उसके पीछे का कटु यथार्थ ,किसी न किसी रूप में सारी दुनिया की असलियत सामने रख रहा है. हम भी उसी  दुनिया के भोगी हैं - इस पाप के भागीदार !अपने भीतर झाँक कर देखें -क्या सबकी आवश्यकताओं का ध्यान रख हम अपनी ज़रूरत भर का ले रहे हैं या सबका हिस्सा हड़प रहे हैं.अपने छोटे से स्वार्थ पूरने को  निसर्ग के तत्वों को प्रदूषित किये जा रहे हैं.दूसरों का जीवन अँधेरा कर रहे हैं. अन्य जीवधारियों का हक छीन कर ,उन्हें जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित कर ,आज का सभ्य कहलानेवाला आदमी अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाये चला जा रहा है . नदियाँ इतनी प्रदूषित कर डालीं कि जल जीवन के योग्य नहीं रहा,  बेबस प्राणी कहाँ जा कर अपनी प्यास बुझायें .धरती, आकाश, सागर कोई ठौर निरापद नहीं रहने दिया. अंतरिक्ष में कूड़े का ढेर इकट्ठा कर दिया .सरल जीवन को जटिल बना कर रख दिया .न शान्ति से रह पाता है न दूसरों को चैन लेने देता है. 
अपनी बेलगाम ज़रूरतों के कारण कितने स्वार्थी हो गया मानव समाज , तृष्णाओँ की कोई सीमा रही ही नहीं .प्रकृति ने जीव-मात्र की तुष्टि और पुष्टि का विधान किया था .इसी क्रम में मनुष्य़ को सर्वाधिक विकसित ,समर्थ और बुद्धिमान बनाया कि वह सबका संरक्षक-सहायक बन अपना दायित्व निभाए . पर वही अब सब के संताप का कारण बन गया है.इस अति का प्रतिफल प्रकृति देगी ज़रूर ,किसी न किसी रूप में,आज नहीं तो कल .
         हमें लौटना होगा प्रकृति की ओर ,सहजताकी ओर . यह बोध जागना बहुत ज़रूरी है कि सब के साथ सहभागिता निभा कर ही हम इस संसार को रहने योग्य बना सकते हैं ,अन्यथा हमारे लिये भी कहीं सुरक्षित ठौर नहीं बचनेवाला .
प्रकृति की योजना का अनुसरण करते निरीह जीवधारियों की प्यास ,तृप्ति पाती रहे ,साँसें निरापद रहें. रात्रियाँ ,काल का ग्रास बने भ्रमजाल का पर्याय न बन विश्राम-प्रहर बनी रहें. चेत जाना है हमें कि सृष्टि की विविधता और निरंतरता बनी रहे.